महाभारत 3.186.97ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम्रत्नाकरममित्रघ्न निधानं पयसो महत्tataḥ samudraṃ paśyāmi yādogaṇaniṣevitamratnākaramamitraghna nidhānaṃ payaso mahatइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें