महाभारत 3.187.16
सत्त्वस्था निरहंकारा नित्यमध्यात्मकोविदाःमामेव सततं विप्राश्चिन्तयन्त उपासते
sattvasthā nirahaṃkārā nityamadhyātmakovidāḥmāmeva satataṃ viprāścintayanta upāsate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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