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महाभारत 3.187.1
देव उवाच · deva uvāca
कामं देवापि मां विप्र न विजानन्ति तत्त्वतःत्वत्प्रीत्या तु प्रवक्ष्यामि यथेदं विसृजाम्यहम्
kāmaṃ devāpi māṃ vipra na vijānanti tattvataḥtvatprītyā tu pravakṣyāmi yathedaṃ visṛjāmyaham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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