महाभारत 3.192.20
एवं स्तुतो हृषीकेश उत्तङ्केन महात्मनाउत्तङ्कमब्रवीद्विष्णुः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु
evaṃ stuto hṛṣīkeśa uttaṅkena mahātmanāuttaṅkamabravīdviṣṇuḥ prītaste'haṃ varaṃ vṛṇu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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