महाभारत 3.193.7पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु बृहदश्वो महीपतिःजगाम तपसे धीमांस्तपोवनममित्रहाputrasaṃkrāmitaśrīstu bṛhadaśvo mahīpatiḥjagāma tapase dhīmāṃstapovanamamitrahāइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें