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महाभारत 3.197.33
जितेन्द्रियो धर्मपरः स्वाध्यायनिरतः शुचिःकामक्रोधौ वशे यस्य तं देवा ब्राह्मणं विदुः
jitendriyo dharmaparaḥ svādhyāyanirataḥ śuciḥkāmakrodhau vaśe yasya taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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