महाभारत 3.199.32
समृद्धैश्च न नन्दन्ति बान्धवा बान्धवैरपिगुरूंश्चैव विनिन्दन्ति मूढाः पण्डितमानिनः
samṛddhaiśca na nandanti bāndhavā bāndhavairapigurūṃścaiva vinindanti mūḍhāḥ paṇḍitamāninaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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