महाभारत 3.2.2
वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियःफलमूलामिषाहारा वनं यास्याम दुःखिताः
vayaṃ hi hṛtasarvasvā hṛtarājyā hṛtaśriyaḥphalamūlāmiṣāhārā vanaṃ yāsyāma duḥkhitāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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