महाभारत 3.2.52
तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृतासतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन
tṛṇāni bhūmirudakaṃ vākcaturthī ca sūnṛtāsatāmetāni geheṣu nocchidyante kadācana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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