महाभारत 3.20.7
एवमुक्त्वा ततो वीर हयान्संचोद्य संगरेरश्मिभिश्च समुद्यम्य जवेनाभ्यपतत्तदा
evamuktvā tato vīra hayānsaṃcodya saṃgareraśmibhiśca samudyamya javenābhyapatattadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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