महाभारत 3.203.32
जीवात्मकानि जानीहि रजः सत्त्वं तमस्तथाजीवमात्मगुणं विद्धि तथात्मानं परात्मकम्
jīvātmakāni jānīhi rajaḥ sattvaṃ tamastathājīvamātmaguṇaṃ viddhi tathātmānaṃ parātmakam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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