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महाभारत 3.203.40
नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेत मत्सरात्विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः
nityaṃ krodhāttapo rakṣecchriyaṃ rakṣeta matsarātvidyāṃ mānāpamānābhyāmātmānaṃ tu pramādataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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