महाभारत 3.203.7
प्रकाशबहुलो धीरो निर्विवित्सोऽनसूयकःअक्रोधनो नरो धीमान्दान्तश्चैव स सात्त्विकः
prakāśabahulo dhīro nirvivitso'nasūyakaḥakrodhano naro dhīmāndāntaścaiva sa sāttvikaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें