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महाभारत 3.206.27
ब्राह्मण उवाच · brāhmaṇa uvāca
कृतप्रज्ञोऽसि मेधावी बुद्धिश्च विपुला तवनाहं भवन्तं शोचामि ज्ञानतृप्तोऽसि धर्मवित्
kṛtaprajño'si medhāvī buddhiśca vipulā tavanāhaṃ bhavantaṃ śocāmi jñānatṛpto'si dharmavit
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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