महाभारत 3.206.2
अजानता मयाकार्यमिदमद्य कृतं मुनेक्षन्तुमर्हसि तत्सर्वं प्रसीद भगवन्निति
ajānatā mayākāryamidamadya kṛtaṃ munekṣantumarhasi tatsarvaṃ prasīda bhagavanniti
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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