महाभारत 3.207.3
अग्निर्यदा त्वेक एव बहुत्वं चास्य कर्मसुदृश्यते भगवन्सर्वमेतदिच्छामि वेदितुम्
agniryadā tveka eva bahutvaṃ cāsya karmasudṛśyate bhagavansarvametadicchāmi veditum
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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