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महाभारत 3.21.11
तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दितःवाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान्प्रणम्य शिरसाहुकम्
taiḥ prahṛṣṭātmabhirvīrairāśīrbhirabhinanditaḥvācayitvā dvijaśreṣṭhānpraṇamya śirasāhukam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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