महाभारत 3.21.2
अपश्यं द्वारकां चाहं महाराज हतत्विषम्निःस्वाध्यायवषट्कारां निर्भूषणवरस्त्रियम्
apaśyaṃ dvārakāṃ cāhaṃ mahārāja hatatviṣamniḥsvādhyāyavaṣaṭkārāṃ nirbhūṣaṇavarastriyam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें