महाभारत 3.21.3
अनभिज्ञेयरूपाणि द्वारकोपवनानि चदृष्ट्वा शङ्कोपपन्नोऽहमपृच्छं हृदिकात्मजम्
anabhijñeyarūpāṇi dvārakopavanāni cadṛṣṭvā śaṅkopapanno'hamapṛcchaṃ hṛdikātmajam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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