महाभारत 3.211.26
यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निनाइष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेऽग्नये
yadyagnayo hi spṛśyeyurniveśasthā davāgnināiṣṭiraṣṭākapālena kāryā tu śucaye'gnaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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