महाभारत 3.211.3
तपसस्तु फलं दृष्ट्वा संप्रवृद्धं तपो महत्उद्धर्तुकामो मतिमान्पुत्रो जज्ञे पुरंदरः
tapasastu phalaṃ dṛṣṭvā saṃpravṛddhaṃ tapo mahatuddhartukāmo matimānputro jajñe puraṃdaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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