महाभारत 3.211.4
ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोऽग्निर्भूतेषु लक्ष्यतेअग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारयत्
ūṣmā caivoṣmaṇo jajñe so'gnirbhūteṣu lakṣyateagniścāpi manurnāma prājāpatyamakārayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें