महाभारत 3.213.7
अभिधावतु मा कश्चित्पुरुषस्त्रातु चैव हपतिं च मे प्रदिशतु स्वयं वा पतिरस्तु मे
abhidhāvatu mā kaścitpuruṣastrātu caiva hapatiṃ ca me pradiśatu svayaṃ vā patirastu me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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