Loading
महाभारत 3.216.4
उग्रं तच्च महावेगं देवानीकं महाप्रभम्विचित्रध्वजसंनाहं नानावाहनकार्मुकम्प्रवराम्बरसंवीतं श्रिया जुष्टमलंकृतम्
ugraṃ tacca mahāvegaṃ devānīkaṃ mahāprabhamvicitradhvajasaṃnāhaṃ nānāvāhanakārmukampravarāmbarasaṃvītaṃ śriyā juṣṭamalaṃkṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें