महाभारत 3.218.7
अभयं च पुनर्दत्तं त्वयैवैषां सुरोत्तमतस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभयंकरः
abhayaṃ ca punardattaṃ tvayaivaiṣāṃ surottamatasmādindro bhavānastu trailokyasyābhayaṃkaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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