महाभारत 3.219.56
यावत्सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम्अतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वरः
yāvatsaptativarṣāṇi bhavantyete grahā nṛṇāmataḥ paraṃ dehināṃ tu grahatulyo bhavejjvaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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