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महाभारत 3.220.11
संभूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत्सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद्भुविआसक्तमन्यद्वृक्षेषु तदेवं पञ्चधापतत्
saṃbhūtaṃ lohitode tu śukraśeṣamavāpatatsūryaraśmiṣu cāpyanyadanyaccaivāpatadbhuviāsaktamanyadvṛkṣeṣu tadevaṃ pañcadhāpatat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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