महाभारत 3.221.57
ततः स महिषः क्रुद्धस्तूर्णं रुद्ररथं ययौअभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूबरम्
tataḥ sa mahiṣaḥ kruddhastūrṇaṃ rudrarathaṃ yayauabhidrutya ca jagrāha rudrasya rathakūbaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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