महाभारत 3.221.65
स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम्मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महाबलः
sa cāpi tāṃ prajvalitāṃ mahiṣasya vidāriṇīmmumoca śaktiṃ rājendra mahāseno mahābalaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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