महाभारत 3.222.17
वर्ताम्यहं तु यां वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसुतां सर्वां शृणु मे सत्यां सत्यभामे यशस्विनि
vartāmyahaṃ tu yāṃ vṛttiṃ pāṇḍaveṣu mahātmasutāṃ sarvāṃ śṛṇu me satyāṃ satyabhāme yaśasvini
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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