महाभारत 3.222.27
अनर्मे चापि हसनं द्वारि स्थानमभीक्ष्णशःअवस्करे चिरस्थानं निष्कुटेषु च वर्जये
anarme cāpi hasanaṃ dvāri sthānamabhīkṣṇaśaḥavaskare cirasthānaṃ niṣkuṭeṣu ca varjaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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