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महाभारत 3.225.2
वैशंपायन उवाच · vaiśaṃpāyana uvāca
सरस्तदासाद्य तु पाण्डुपुत्रा; जनं समुत्सृज्य विधाय चैषाम्वनानि रम्याण्यथ पर्वतांश्च; नदीप्रदेशांश्च तदा विचेरुः
sarastadāsādya tu pāṇḍuputrā; janaṃ samutsṛjya vidhāya caiṣāmvanāni ramyāṇyatha parvatāṃśca; nadīpradeśāṃśca tadā viceruḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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