महाभारत 3.226.15
महाभिजनसंपन्नं भद्रे महति संस्थितम्पाण्डवास्त्वाभिवीक्षन्तां ययातिमिव नाहुषम्
mahābhijanasaṃpannaṃ bhadre mahati saṃsthitampāṇḍavāstvābhivīkṣantāṃ yayātimiva nāhuṣam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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