महाभारत 3.227.14अहमप्यद्य निश्चित्य गमनायेतराय वाकाल्यमेव गमिष्यामि समीपं पार्थिवस्य हahamapyadya niścitya gamanāyetarāya vākālyameva gamiṣyāmi samīpaṃ pārthivasya haइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें