महाभारत 3.23.8
एवं दश दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च भारतनादयामासुरसुरास्ते चापि निहता मया
evaṃ daśa diśaḥ sarvāstiryagūrdhvaṃ ca bhāratanādayāmāsurasurāste cāpi nihatā mayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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