महाभारत 3.237.8
एवमुक्ते तु धर्मात्मा ज्येष्ठः पाण्डुसुतस्तदाप्रसाद्य सोदरान्सर्वानाज्ञापयत मोक्षणे
evamukte tu dharmātmā jyeṣṭhaḥ pāṇḍusutastadāprasādya sodarānsarvānājñāpayata mokṣaṇe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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