महाभारत 3.238.42
यद्येवं पाण्डवै राजन्भवद्विषयवासिभिःयदृच्छया मोक्षितोऽद्य तत्र का परिदेवना
yadyevaṃ pāṇḍavai rājanbhavadviṣayavāsibhiḥyadṛcchayā mokṣito'dya tatra kā paridevanā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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