महाभारत 3.241.7
दृष्टस्ते विक्रमश्चैव पाण्डवानां महात्मनाम्कर्णस्य च महाबाहो सूतपुत्रस्य दुर्मतेः
dṛṣṭaste vikramaścaiva pāṇḍavānāṃ mahātmanāmkarṇasya ca mahābāho sūtaputrasya durmateḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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