महाभारत 3.245.28
परित्यज्य प्रियान्प्राणान्धनार्थं हि महाहवम्प्रविशन्ति नरा वीराः समुद्रमटवीं तथा
parityajya priyānprāṇāndhanārthaṃ hi mahāhavampraviśanti narā vīrāḥ samudramaṭavīṃ tathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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