महाभारत 3.246.27
प्रीताः स्मोऽनुगृहीताश्च समेत्य भवता सहइन्द्रियाभिजयो धैर्यं संविभागो दमः शमः
prītāḥ smo'nugṛhītāśca sametya bhavatā sahaindriyābhijayo dhairyaṃ saṃvibhāgo damaḥ śamaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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