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महाभारत 3.246.35
सतां सप्तपदं मित्रमाहुः सन्तः कुलोचिताःमित्रतां च पुरस्कृत्य पृच्छामि त्वामहं विभो
satāṃ saptapadaṃ mitramāhuḥ santaḥ kulocitāḥmitratāṃ ca puraskṛtya pṛcchāmi tvāmahaṃ vibho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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