महाभारत 3.251.8
स प्रविश्याश्रमं शून्यं सिंहगोष्ठं वृको यथाआत्मना सप्तमः कृष्णामिदं वचनमब्रवीत्
sa praviśyāśramaṃ śūnyaṃ siṃhagoṣṭhaṃ vṛko yathāātmanā saptamaḥ kṛṣṇāmidaṃ vacanamabravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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