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महाभारत 3.252.3
न किंचिदीड्यं प्रवदन्ति पापं; वनेचरं वा गृहमेधिनं वातपस्विनं संपरिपूर्णविद्यं; भषन्ति हैवं श्वनराः सुवीर
na kiṃcidīḍyaṃ pravadanti pāpaṃ; vanecaraṃ vā gṛhamedhinaṃ vātapasvinaṃ saṃparipūrṇavidyaṃ; bhaṣanti haivaṃ śvanarāḥ suvīra
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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