Loading
महाभारत 3.252.4
अहं तु मन्ये तव नास्ति कश्चि;देतादृशे क्षत्रियसंनिवेशेयस्त्वाद्य पातालमुखे पतन्तं; पाणौ गृहीत्वा प्रतिसंहरेत
ahaṃ tu manye tava nāsti kaści;detādṛśe kṣatriyasaṃniveśeyastvādya pātālamukhe patantaṃ; pāṇau gṛhītvā pratisaṃhareta
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें