महाभारत 3.259.7
पुष्पोत्कटायां जज्ञाते द्वौ पुत्रौ राक्षसेश्वरौकुम्भकर्णदशग्रीवौ बलेनाप्रतिमौ भुवि
puṣpotkaṭāyāṃ jajñāte dvau putrau rākṣaseśvaraukumbhakarṇadaśagrīvau balenāpratimau bhuvi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें