महाभारत 3.261.33
अयशः पातयित्वा मे मूर्ध्नि त्वं कुलपांसनेसकामा भव मे मातरित्युक्त्वा प्ररुरोद ह
ayaśaḥ pātayitvā me mūrdhni tvaṃ kulapāṃsanesakāmā bhava me mātarityuktvā praruroda ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें