महाभारत 3.261.3
मार्कण्डेय उवाच · mārkaṇḍeya uvāca
जातपुत्रो दशरथः प्रीतिमानभवन्नृपःक्रियारतिर्धर्मपरः सततं वृद्धसेविता
jātaputro daśarathaḥ prītimānabhavannṛpaḥkriyāratirdharmaparaḥ satataṃ vṛddhasevitā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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