महाभारत 3.261.41वसतस्तस्य रामस्य ततः शूर्पणखाकृतम्खरेणासीन्महद्वैरं जनस्थाननिवासिनाvasatastasya rāmasya tataḥ śūrpaṇakhākṛtamkhareṇāsīnmahadvairaṃ janasthānanivāsināइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें