महाभारत 3.261.43
दूषणं च खरं चैव निहत्य सुमहाबलौचक्रे क्षेमं पुनर्धीमान्धर्मारण्यं स राघवः
dūṣaṇaṃ ca kharaṃ caiva nihatya sumahābalaucakre kṣemaṃ punardhīmāndharmāraṇyaṃ sa rāghavaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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