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महाभारत 3.261.48
कः शूलं तीक्ष्णमासाद्य सर्वगात्रैर्निषेवतेकः शिरस्यग्निमादाय विश्वस्तः स्वपते सुखम्
kaḥ śūlaṃ tīkṣṇamāsādya sarvagātrairniṣevatekaḥ śirasyagnimādāya viśvastaḥ svapate sukham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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